2027 का चुनावी रण : किस ओर घूमेगा चकराता का राजनीतिक चक्र, प्रीतम सिंह या रामशरण नौटियाल ?

देहरादून। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर सियासी माहौल गरमाया हुआ है। 2027 के विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े 2026 को अहम साल माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव जनवरी-फरवरी में ही संभव हैं। ऐसे में सभी पार्टियां अपनी रणनीति बनाने में जुट गई हैं। देहरादून जिले की चकराता विधानसभा सीट हमेशा सुर्खियों में रहती है, और इस बार भी यहां की राजनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं। सवाल यह है कि 2027 में चकराता का राजनीतिक चक्र किसकी ओर घूमेगाकृकांग्रेस की मजबूत पकड़ बरकरार रहेगी, भाजपा बाजी मारेगी, या उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा का जलवा चलेगा?

चकराता सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह का दबदबा लंबे समय से कायम है। वे लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं, और उनकी मजबूत पकड़ के चलते कांग्रेस यहां मजबूत किला मानी जाती है। लेकिन क्या इस बार भी प्रीतम सिंह आसानी से जीत दर्ज कर पाएंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते समीकरणों में चुनौती बढ़ सकती है।

भाजपा इस सीट पर कांग्रेस के गढ़ को तोड़ने की कोशिश में जुटी है। फिलहाल, पार्टी ने उम्मीदवार तय नहीं किया है, लेकिन राम शरण नौटियाल को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। नौटियाल को क्षेत्र में मजबूत जनाधार वाला नेता माना जाता है। वे गंभीर और बेदाग छवि का नेता माना जाता है, जो हमेशा लोगों की मदद में आगे रहते हैंकृचाहे आपदा हो या कोई अन्य संकट। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर भाजपा अपनी गुटबाजी पर काबू पा लेती है, तो यहां जीत की राह आसान हो सकती है। भाजपा में गुटबाजी हमेशा से समस्या रही है, जिसका फायदा कांग्रेस को मिलता आया है।

इस बीच, उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के बॉबी पंवार भी मैदान में ताल ठोंकने की तैयारी में हैं। वे पूरी ताकत से चुनावी तैयारियों में जुटे हैं। लोकसभा चुनाव में उन्हें अच्छा समर्थन मिला था, लेकिन विधानसभा में चुनौतियां अलग हैं। बॉबी की युवा वोटरों में अच्छी पकड़ मानी जाती है, और अगर वे समर्थन को वोटों में बदल पाए, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि परिस्थितियां उनके लिए उतनी आसान नहीं होंगी। कुल मिलाकर, चकराता सीट पर 2027 का चुनाव रोमांचक होने वाला है। कांग्रेस को अपनी पकड़ बचानी है, भाजपा को गढ़ ढहाना है, और बॉबी पंवार जैसे नए चेहरे मुकाबले को तीखा बना सकते हैं। आने वाले महीनों में पार्टियों की रणनीतियों से इसकी तस्वीर साफ हो पाएगी।

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