नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त मामला: PWD के दो अभियंता निलंबित, बड़ा सवाल निर्माण एजेंसी पर कार्रवाई कब?

देहरादून। देहरादून-पांवटा साहिब पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग पर नंदा की चौकी स्थित टोंस नदी पर नव निर्मित पुल की एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त होने के मामले में शासन ने सख्त कार्रवाई करते हुए लोक निर्माण विभाग के दो अभियंताओं को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। प्रारंभिक जांच में पुल की डिजाइन से लेकर तकनीकी निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण तक कई गंभीर कमियां सामने आने की बात कही गई है।

शासन की ओर से जारी आदेश के अनुसार, प्रारंभिक जांच में प्रथम दृष्टया पाया गया कि Design Consultant द्वारा River Diversion Work का डिजाइन उपलब्ध कराया जाना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके अलावा नदी के तल के Cross Slope और नदी के Meandering Nature को ध्यान में रखते हुए River Training के लिए आवश्यक उपाय भी डिजाइन स्तर पर नहीं दिए गए।

जांच के मुताबिक, इन तकनीकी कमियों के चलते नदी का प्रवाह एक ही स्पान की ओर केंद्रित हो गया। इससे पुल के Abutment के Upstream हिस्से में भारी Scouring हुई और एप्रोच रोड के नीचे Cavity बनने के कारण सड़क क्षतिग्रस्त हो गई।

अधिशासी अभियंता राजेश कुमार निलंबित

शासन ने मामले में प्रान्तीय खंड, लोक निर्माण विभाग, देहरादून के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार को निलंबित किया है। आदेश में कहा गया है कि कार्य की तकनीकी निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण, अनुबंधीय शर्तों का अनुपालन और दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं किया गया।

शासन के अनुसार, यह प्रथम दृष्टया शासकीय कार्यों के प्रति घोर लापरवाही, पर्यवेक्षण में शिथिलता और दायित्वों के निर्वहन में गंभीर त्रुटि का द्योतक है। इसके कारण शासन की छवि प्रभावित होने के साथ सार्वजनिक हित भी प्रभावित हुआ।

सहायक अभियंता अमित त्यागी पर भी गिरी गाज

मामले में सहायक अभियंता अमित त्यागी को भी तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। जांच में कहा गया है कि उनके जिम्मे कार्य की तकनीकी निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण, अनुबंधीय शर्तों के अनुपालन के साथ-साथ वरिष्ठ अधिकारियों को आवश्यक तकनीकी कमियों से अवगत कराने की जिम्मेदारी थी, लेकिन उन्होंने इन दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं किया।

शासन ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ उत्तराखंड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003 के नियम-4(1) के तहत कार्रवाई की है। निलंबन अवधि में उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल: ठेकेदार और निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी क्या?

इस पूरे प्रकरण में विभागीय अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जरूर हुई है, लेकिन सबसे अहम सवाल निर्माण कार्य करने वाली कंपनी/ठेकेदार और संबंधित निर्माण एजेंसी की जवाबदेही को लेकर खड़ा हो रहा है।

यदि प्रारंभिक जांच में पुल की एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने के पीछे डिजाइन में कमी, नदी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक उपायों का अभाव और तकनीकी खामियां सामने आई हैं, तो यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदार की भूमिका क्या रही?

क्या निर्माण के दौरान स्वीकृत डिजाइन और तकनीकी मानकों का पूरी तरह पालन किया गया था?

क्या निर्माण एजेंसी ने नदी के वास्तविक प्रवाह और स्थल की भौगोलिक परिस्थितियों का परीक्षण किया था?

क्या निर्माण के दौरान सामने आई तकनीकी कमियों की जानकारी विभाग को दी गई थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—यदि निर्माण में गुणवत्ता या अनुबंधीय शर्तों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित ठेकेदार या कंपनी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?

सिर्फ अधिकारियों का निलंबन पर्याप्त है?

सरकार ने मामले को गंभीर मानते हुए विभागीय अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, लेकिन सार्वजनिक धन से बने एक नए पुल की एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने के मामले में जवाबदेही की पूरी श्रृंखला तय करना जरूरी है।

यदि जांच में ठेकेदार, निर्माण एजेंसी या डिजाइन कंसल्टेंट की भी भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई, क्षतिपूर्ति की वसूली और अनुबंधीय दंड की कार्रवाई की जानी चाहिए। आखिरकार निर्माण कार्य में केवल विभागीय अधिकारियों की ही नहीं, बल्कि डिजाइन कंसल्टेंट, ठेकेदार और संबंधित निर्माण एजेंसी की भी भूमिका होती है।

अब देखना होगा कि सरकार की आगे की विस्तृत जांच में इन सभी पक्षों की जिम्मेदारी तय होती है या मामला केवल विभागीय अधिकारियों के निलंबन तक ही सीमित रह जाता है।

नंदा की चौकी पुल प्रकरण ने एक बार फिर सरकारी निर्माण कार्यों में डिजाइन, गुणवत्ता नियंत्रण, तकनीकी निगरानी और ठेकेदार की जवाबदेही को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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