भव्य शोभायात्रा के साथ संपन्न हुआ अल्मोड़ा का ऐतिहासिक नंदा देवी मेला

  • मां नंदा-सुनंदा के जयकारों से गूंज उठी सांस्कृतिक नगरी.
  • डोबानौला में विधि-विधान से हुआ प्रतिमाओं का विसर्जन.

अल्मोड़ा। उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में करीब चार शताब्दियों से चली आ रही नंदा देवी मेले की परंपरा बुधवार को मां नंदा-सुनंदा की भव्य शोभायात्रा और प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ संपन्न हो गई। मां नंदा-सुनंदा को विदाई देने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े। पूरे नगर में दिनभर धार्मिक उल्लास का माहौल रहा और मां के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। मेले के समापन अवसर पर चंद वंशज नरेंद्र चंद राज सिंह ने विधि-विधान के साथ मां नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना की। इसके बाद मंदिर परिसर से मां का डोला निकाला गया। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच डोला नगर के प्रमुख बाजारों से होकर गुजरा।

मंदिर से डोबानौला तक निकली भव्य शोभायात्रा

मां नंदा-सुनंदा की शोभायात्रा नंदा देवी मंदिर परिसर से शुरू होकर लाला बाजार, बंसल गली और माल रोड होते हुए ड्यूयोलीपोखर पहुंची। यहां श्रद्धालुओं की मौजूदगी में मां की आरती की गई। इसके बाद डोला सीढ़ी बाजार होते हुए चौक बाजार पहुंचा। शोभायात्रा कचहरी बाजार और जौहरी बाजार से होकर कैंट क्षेत्र स्थित दुगलखोला के डोबानौला पहुंची। यहां वैदिक एवं पारंपरिक विधि-विधान के साथ मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। विसर्जन के बाद चंद वंशजों ने मंदिर पहुंचकर पुनः पूजा-अर्चना की।

15 सितंबर से शुरू हुआ था मेला

नंदा देवी मेला 15 सितंबर से शुरू हुआ था। मेले के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों, लोक संस्कृति और धार्मिक आयोजनों ने श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित किया। अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की लोक परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

करीब 400 वर्षों से चली आ रही परंपरा

इतिहास और साहित्य से जुड़े जानकारों के अनुसार अल्मोड़ा में नंदा देवी मेले की परंपरा करीब 400 वर्षों पुरानी है। माना जाता है कि चंदवंशी शासकों के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान मल्ला महल से इस मेले की शुरुआत हुई थी। मेले के साथ नंदा जागर गायन की परंपरा भी लंबे समय से जुड़ी हुई है। अल्मोड़ा के छानी-लवेशाल गांव के जागर गाने वाले परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। हर वर्ष मेले के दौरान गांव के जागरिए अल्मोड़ा पहुंचकर मां नंदा की आराधना में पारंपरिक जागर का गायन करते हैं।

तीन पहर तक गाई जाती है नंदा जागर

नंदा देवी मेले की प्रमुख विशेषताओं में पारंपरिक जागर गायन शामिल है। स्थानीय परंपरा के अनुसार नंदा जागर में देवी-देवताओं की स्तुति के साथ पौराणिक प्रसंगों, लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक गाथाओं का वर्णन किया जाता है। साहित्यकार एवं प्रोफेसर देव सिंह पोखरिया के अनुसार नंदा जागर में सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है। शाम के समय होने वाली जागर में आदिदेवी नंदा के साथ अन्य देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है और पारंपरिक शैली में उनसे जुड़ी गाथाओं एवं लोककथाओं का गायन किया जाता है।

लोक संस्कृति और सामूहिक स्मृति का हिस्सा

नंदा जागर की परंपरा धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ उत्तराखंड की मौखिक लोक-संस्कृति को संरक्षित करने का माध्यम भी है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के जरिए लोकगाथाएं, पौराणिक प्रसंग और सांस्कृतिक स्मृतियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं। नंदा देवी मेला इसी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेले में स्थानीय परंपराओं और लोक कलाओं की झलक देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

अल्मोड़ा की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आयोजन

अल्मोड़ा अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। शहर के प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक भवन, पारंपरिक बाजार और लोक कलाएं इसकी विशिष्ट पहचान का हिस्सा हैं। नंदा देवी मेला इसी विरासत का एक प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है। अल्मोड़ा का संबंध साहित्य, कला और अध्यात्म से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियों से भी रहा है। स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और सुमित्रानंदन पंत जैसी विभूतियों का इस क्षेत्र से जुड़ाव रहा है।

महान नर्तक उदय शंकर ने भी अल्मोड़ा को अपनी कला साधना के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया था। चार शताब्दियों से चली आ रही नंदा देवी मेले की परंपरा एक बार फिर मां नंदा-सुनंदा की विदाई के साथ संपन्न हुई, लेकिन इसके साथ जुड़ी लोक आस्था, जागर गायन और सांस्कृतिक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक जारी रहने की उम्मीद है।

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