नेपाल की अचानक आई बाढ़ का सामने आया कारण, ISRO के सैटेलाइट आकलन में भूकंप से ग्लेशियर ढहने के संकेत
नई दिल्ली। नेपाल के रसुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ के पीछे हिमालयी क्षेत्र में हुई घटनाओं की एक पूरी कड़ी सामने आई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की शाखा नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के शुरुआती सैटेलाइट-आधारित आकलन के मुताबिक, तिब्बत के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में 4.9 तीव्रता के भूकंप के बाद सर्क ग्लेशियर का एक हिस्सा ढहने और उसके चलते बर्फ व चट्टानों का भारी मलबा नीचे आने की आशंका है।
नदी का रास्ता रुका, फिर टूटा बांध
NRSC के विश्लेषण के अनुसार, ग्लेशियर के ढहने से उत्पन्न हिमस्खलन ने पहाड़ी नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया। इससे पानी और मलबा जमा होता गया। बाद में यह प्राकृतिक अवरोध टूटने पर पानी, कीचड़, बर्फ और चट्टानों का विशाल सैलाब तेजी से नीचे की ओर बहा और त्रिशूली नदी प्रणाली में पहुंचकर अचानक बाढ़ का रूप ले लिया।
4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज
भारत के भूकंप निगरानी नेटवर्क के अनुसार, घटना के दौरान सुबह करीब 8:22 बजे 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी ने भूकंप का केंद्र 28.076 अक्षांश और 86.494 देशांतर तथा गहराई करीब 10 किलोमीटर दर्ज की। हिमालय को भूकंपीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है।
सैटेलाइट तस्वीरों से हुआ आकलन
NRSC, हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना कर प्रभावित क्षेत्र का जियोस्पेशियल आकलन किया। इसके लिए 24 अगस्त को यूरोप के Sentinel-2 उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों की तुलना 26 अगस्त को ISRO के Resourcesat-2A से ली गई तस्वीरों से की गई। इसके अलावा 4 अप्रैल 2026 की Resourcesat-2A तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया गया, ताकि बाढ़ के बाद जमीन और नदी के रास्ते में हुए बदलावों की पहचान की जा सके।
नदी के मार्ग में बड़े बदलाव
सैटेलाइट तस्वीरों के अध्ययन में नदी के प्रवाह क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बदलाव दिखाई दिए हैं। कई स्थानों पर मलबा जमा होने तथा बाढ़ के पानी से भू-भाग प्रभावित होने के संकेत मिले हैं। इन बदलावों के आधार पर वैज्ञानिकों ने आपदा के फैलाव और संभावित घटनाक्रम को समझने का प्रयास किया है।
सर्क ग्लेशियर क्यों है महत्वपूर्ण?
सर्क ग्लेशियर पहाड़ों की ढलानों पर कटोरेनुमा भू-आकृति में बनने वाला ग्लेशियर होता है। लंबे समय तक बर्फ जमा होने के कारण यहां बर्फ और मलबे का भारी दबाव बन सकता है। भूकंपीय गतिविधि या अन्य भू-वैज्ञानिक एवं मौसम संबंधी परिस्थितियों से संतुलन बिगड़ने पर ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिर सकता है और इससे हिमस्खलन तथा मलबे का तेज बहाव पैदा हो सकता है।
वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन में भी इसी तरह की घटनाओं की श्रृंखला की संभावना जताई गई है—पहले भूकंप, फिर ग्लेशियर का ढहना, बर्फ और चट्टानों का मलबा नीचे आना, नदी का अस्थायी रूप से अवरुद्ध होना और अंत में जमा पानी व मलबे का अचानक बह निकलना। इस पूरी प्रक्रिया ने स्थानीय स्तर की पहाड़ी घटना को बड़े क्षेत्र में फैलने वाली विनाशकारी बाढ़ में बदल दिया।
आपदा प्रबंधन में अंतरिक्ष तकनीक की बढ़ती भूमिका
रसुवा की घटना ने एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी और राहत-बचाव कार्यों में सैटेलाइट तकनीक की उपयोगिता को सामने रखा है। बाढ़, भूस्खलन, जंगल की आग और अन्य आपदाओं में आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना कर प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, नुकसान का आकलन और घटनाक्रम को समझने में वैज्ञानिकों तथा राहत एजेंसियों को मदद मिलती है।
